कोटा: भागवत कथा में सुनाया श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग, श्रद्धालुओं ने की पुष्पवर्षा और भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता का प्रसंग सुनाया
कोटा: दिनांक 15 अगस्त श्री बेटन सिंह चौहान एवं श्रीमती कुषमा देवी चौहान परिवार द्वारा आयोजित अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) के पावन अवसर पर जय अम्बे नगर, रंगबाड़ी, पुलिस चौकी के पास, कोटा (राजस्थान) में श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के सप्तम दिवस पर परम पूज्य डॉ. कार्ष्णि पं. भरत जी महाराज ने भागवत में सप्तम दिवस पर श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग सुनाया। और भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता का प्रसंग भी सुनाया।
चौहान परिवार द्वारा आयोजित जय अम्बे नगर, रंगबाड़ी, कोटा में श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस कथा सुनाते हुए कथा वाचक डॉ. कार्ष्णि पं. भरत जी महाराज ने सप्तम दिवस पर श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग सुनाया। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह को व भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता के प्रसंग को एकाग्रता से सुना। भारी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया।
प्रसंग में महाराज ने कहा कि रुक्मणी विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री और साक्षात लक्ष्मी जी का अवतार थी। रुक्मणी ने जब देवर्षि नारद के मुख से श्रीकृष्ण के रूप, सौंदर्य एवं गुणों की प्रशंसा सुनी तो उसने मन ही मन श्रीकृष्ण से विवाह करने का निश्चय किया। रुक्मणी का बड़ा भाई रुक्मी श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था और अपनी बहन का विवाह चेदिनरेश राजा दमघोष के पुत्र शिशुपाल से कराना चाहता था। रुक्मणी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने एक ब्राह्मण संदेशवाहक द्वारा श्रीकृष्ण के पास अपना परिणय संदेश भिजवाया। तब श्रीकृष्ण विदर्भ देश की नगरी कुंडीनपुर पहुंचे और वहां बारात लेकर आए शिशुपाल व उसके मित्र राजाओं शाल्व, जरासंध, दंतवक्त्र, विदु रथ और पौंडरक को युद्ध में परास्त करके रुक्मणी का उनकी इच्छा से हरण कर लाए। वे द्वारिकापुरी आ ही रहे थे कि उनका मार्ग रुक्मी ने रोक लिया और कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। तब युद्ध में श्रीकृष्ण व बलराम ने रुक्मी को पराजित करके दंडित किया। तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने द्वारिका में अपने संबंधियों के समक्ष रुक्मणी से विवाह किया।
सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कथा व्यासजी ने बताया कि मित्रता कैसे निभाई जाए यह भगवान श्री कृष्ण सुदामा जी से समझ सकते हैं। उन्होंने कहा कि सुदामा अपनी पत्नी के आग्रह पर अपने मित्र (सखा) से सुदामा मिलने के लिए द्वारिका पहुंचे। उन्होंने कहा कि सुदामा द्वारिकाधीश के महल का पता पूछा और महल की ओर बढ़ने लगे द्वार पर द्वारपालों ने सुदामा को भिक्षा मांगने वाला समझकर रोक दिया। तब उन्होंने कहा कि वह कृष्ण के मित्र हैं। इस पर द्वारपाल महल में गए और प्रभु से कहा कि कोई उनसे मिलने आया है।अपना नाम सुदामा बता रहा है। जैसे ही द्वारपाल के मुंह से उन्होंने सुदामा का नाम सुना प्रभु सुदामा सुदामा कहते हुए तेजी से द्वार की तरफ भागे सामने सुदामा सखा को देखकर उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया। सुदामा ने भी कन्हैया कन्हैया कहकर उन्हें गले लगाया और सुदामा को अपने महल में ले गए ओर उनका अभिनंदन किया।
आयोजक : श्री बेटन सिंह चौहान एवं श्रीमती कुषमा देवी चौहान पुत्र: उम्मेद सिंह- सुधा देवी पौत्र हर्षित चौहान, उदल सिंह – अर्चना चौहान पुत्र अभय प्रताप सिंह चौहान, पुत्री: आयुषि चौहान ने प्रथम दिवस कथा का श्रवण लाभ उठाया।
इस कथा का लाइव प्रसारण A-one imagine TV चैनल द्वारा भारत सहित 126 देशों में किया जा रहा है। साथ ही सोशल मीडिया यूट्यूब, फेसबुक के द्वारा भी प्रसारण हो रहा है।

